विवाह..रिश्ता नहीं बस नाम का !!


सुगंधा और सुदेश की दो बेटियाँ थी- सारंगी और सपना। अपनी बड़ी बेटी सारंगी के विवाह के लिए वे लड़का देख रहे थे। कुछ प्रस्ताव आये थे उन्हें सुदेश सुंगधा को दिखा रहा था ताकि जो ठीक लगे पहले उसके बारे में सारंगी से बात करके लड़के वालों से बात की जाये। सपना भी अपने मम्मी पापा के पास बैठी लड़को की तस्वीर व बायोडेटा पढ़ रही। वह पापा से कहती है पापा हर किसी को लड़की नौकरी करने वाली होने के साथ सुन्दर, पढ़ी-लिखी,घर के कामों में निपुण... बड़ों की इज्जत व सेवा करने वाली ..संस्कारी..आदि आदि गुणों से युक्त चाहिए। उनकी लड़की के लिए गुणों की दी सूची को पढ़कर मुझे ऐसा लगता है कि इन्हें बीवी नहीं टीवी की जरूरत है। क्योंकि इतने गुण तो टीवी में ही देखने को मिल सकते हैं तो जब इन्हें जैसा रूप देखना हो चैनल बदल दें और वह हाजिर.. पापा क्या मजाक है.. उसकी बात सुनकर सुगंधा बेटी को डांटते हुए बोली, “ऐसे नहीं कहते ...।“ तभी अपने पति को हँसता देख तुनक कर बोल उठी, “तुम लोगों से तो कुछ कहना ही बेकार है बच्चे तो बच्चे बाप रे बाप!”

यह वास्तविकता है आज के समाज की। लड़के से उसके जीवन साथी के विषय में पूछा जाता है तो हर कोई सुन्दर और नौकरी करने वाली लड़की चाहता है। साथ ही परिवार वाले चाहते हैं लड़की घर के कामों में निपुण हो, नाचना गाना जानती हो .....कहने का मतलब है सर्व गुण संपन्न हो! घर से बाहर जाकर नौकरी भी कर ले और घर और परिवार के अनुसार भी चले...। घर और नौकरी दोनों को एक साथ बिना परिवार के सहयोग के चला पाना मुश्किल हो जाता है क्योंकि पहले की बात अलग थी जब महिलाओं को केवल घर का काम करना होता था। पुरूष सहयोग न भी करें तो चलता था पर देखा जाये तो आज लड़कियाँ दो-दो नौकरियाँ एक साथ कर रही हैं...

देखने में आ रहा है कि लड़कियाँ आज यह सब सोचकर अब शादी नहीं करना चाहती हैं और वे इन सबसे अकेले रहना ज्यादा पसन्द कर रही हैं... ये सोच धीरे-धीरे बढ़ रही है। आपको यह नहीं लगता कि ऐसी सोच हमारे समाज के लिए घातक है क्योंकि इससे परिवार व्यवस्था कहीं न कहीं खत्म होने की कगार पर आ जाएगी...यह समय है यह समझने और समझाने का कि विवाह बंधन के सही मायने आखिर हैं क्या?

ये रिश्ता नही व्यापार का, ये रिश्ता पूर्ण समर्पण का है! 

ये रिश्ता नही बस नाम का, ये रिश्ता सच्चे साथ का है!



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