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धरा पर स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ!

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बेटियाँ बोझ नहीं होतीं… ‘नवयुग’ यही कहता है। खुशियाँ लुटाती हैं, दुःख-दर्द को अपने दिल में समेट लेती हैं। हर रिश्ते को सहेजकर रखने वाली, इसलिए तो ‘धारिणी’ कहलाती हैं बेटियाँ। बेटियाँ अब सहारा बन गई हैं… जैसे सुबह का सूरज नई उम्मीद देता है, वैसे ही बेटियाँ हर घर को रोशन करती हैं। जलती-तपती भी हैं, और शाम की ठंडक बनकर सुकून भी देती हैं। किसी से कम नहीं हैं बेटियाँ। देखो तो सही… हर कर्तव्य निभा रही हैं बेटियाँ। कहीं मीरा की भक्ति, कहीं लक्ष्मी की समृद्धि, कहीं दुर्गा की शक्ति, तो कहीं सरस्वती की बुद्धि बनकर हर रूप में नज़र आती हैं बेटियाँ। नदी की धारा सी बहती हैं, मशाल की तरह जलती हैं। सूरज की लालिमा भी हैं, और हवा की खुशबू भी। आसमान में सितारों सी जगमगाती हुई, धरती को स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ।

तुम उड़ो! तुम आनंद मनाओ!

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  तुम मस्ती करो! खुद को लाइवली रखो! थोड़ी बहुत चीटिंग भी करो! सिर्फ परिवार, पति और बच्चों का मत सोचो अपने बारे में सोचना सीखो!   घर की देखभाल करती हो न? अब खुद की भी करो! तुम्हारे भीतर एक नटखट, खुशमिजाज लड़की छुपी हुई है जी, उसकी तारीफ करो।   अधिक नहीं, लेकिन दिन का एक घंटा खुद के लिए रखो और उस एक घंटे में, जो तुम्हें अच्छा लगता है, वो करो। तुम्हारे भीतर जो लड़की है न, उसे कभी-कभी गलती करना भी अच्छा लगता है, तो करो।   कोई फर्क नहीं पड़ता, हर कोई अपने हिसाब से खुशियाँ ढूँढ़ रहा है, फिर तुम क्यों पीछे रहो! सखियाँ बनाओ, खुद को व्यक्त करो।   कभी-कभी उस डायट चार्ट को बाजू में रख दो, मस्त बटर मस्तानी खाओ, हो जाने दो जरा इधर-उधर, कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग क्या सोचेंगे..माय फुट बच्चों को कम मार्क्स आएँ कभी, तो जाने दो ना।   उम्र हो गई है...अब क्या रखा है इसमें... ऐसे शब्द कभी मत बोलो, क्योंकि उम्र तो एक संख्या ही है जी, खूब किया सबके लिए, अब निकालो समय खुद के लिए, तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान देख, यकीन है मुझे, सारा घर हँसेगा जी।   एक बात याद रखना .. तुम खुश नहीं रहो...

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