क़ुरबानी का पर्व....ईद उल अजहा!
‘ईद-उल-अजहा’ मुस्लिमों का बड़ा त्योहार माना जाता है। ‘ईद-उल-अजहा’ का त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में मनाया जाता है। ‘ईद-उल-अजहा’ एक अरबी शब्द है इसका मतलब है ‘ईद-ए-कुर्बानी’ यानी बलिदान की भावना। इसे कुर्बानी की ईद , सुन्नत-ए-इब्राहीम और बकरीद भी कहते हैं। पर इस शब्द का बकरों से कोई संबंध नहीं है। असल में अरबी में 'बक़र' का अर्थ है बड़ा जानवर जो काटा जाता है। उसी से बिगड़कर यह शब्द बना है। आज भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे 'बकरा ईद' कहा जाता है। कब मनाया जाता है- ‘ईद-उल-अजहा’ का यह त्योहार रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग ७० दिनों बाद हिजरी के आखिरी महीने जुल हिज्ज में मनाया जाता है। जहाँ ईद-उल-फितर प्रेम और मिठास जीवन में घोलने का संदेश देता है, वहीं ईद-उल-अज़हा अपने फर्ज के लिए कुर्बानी की भावना सिखाता है। इस दिन अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी दी जाती है. कुर्बानी उस पशु के जि़बह( काटना) करने को कहते हैं जिसे 10, 11, 12 या 13 जि़लहिज्ज (हज का महीना) को खुदा को खुश करने के लिए ज़िबिह किया जाता है। कुरान में लिखा है : ‘हमने तुम्हें हौज़-ए...