वन विनाश....सोचो मानव.....
इस बार तो सावन का महीना आया और जाने भी वाला है पर सावन जैसी कोई बात नहीं थी। वो आनंद कहीं नहीं था, न पानी की फुहार ,न ठंडी- ठंड़ी बयार,छाता न लेकर जाना और बारिश में भीग कर आना, घर आकर माँ से ड़ाँट खाना,गर्म चाय के साथ पकौडों की फरमाईश करना कहीं खो सा गया था।
दिन प्रतिदिन बदलते पर्यावरण के लिए कहीं न कहीं हम ही दोषी हैं। प्रगति की दौड़ में हम अपनी प्रकृति के प्रति अपने कर्त्तव्य भूल गये हैं। निरन्तर वन कट रहे हैं,हरियाली कहीं दिखती नहीं, दूर-दूर तक कंक्रीट के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे दिखने लगा है - वर्षा कम होने लगी है,जहाँ हो रही है वहाँ बाढ़ ने तबाही मचा रखी है, पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गया है, गर्मी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। परन्तु अभी भी इतनी देर नहीं हुई है, यदि मानव धरा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को याद कर पूरी ईमानदारी से निभाने का संकल्प करे तो आने वाले पर्यावरणीय संकट से बचा जा सकता है।
मैंने इन पक्तियों में इन ही विचारों को शब्दबद्ध कर कहने की कोशिश की है -
वन संरक्षण को अपनाना है,
धरा को अपनी बचाना है।
वन ही जीवन का पर्याय है,
वन विनाश
धरा के साथ अन्याय है।
रोका न अगर
वनों का विनाश,
जीवन में सर्वत्र होगा
त्रास ही त्रास।
होगी कैसे बारिश
अगर पेड़ गये कट,
मत मूंदों अपनी आँखे
वन विनाश एक घोर संकट।
सूख जायेंगे
नदी और नाले सारे,
जाएेंगे कहाँ
जंगली जानवर बेचारे।
हे मंदबुद्धि मानव
अब तो जागो जरा,
वरना क्षमा न करेगी
तुमको ये जीवनदायिनी धरा।
दिन प्रतिदिन बदलते पर्यावरण के लिए कहीं न कहीं हम ही दोषी हैं। प्रगति की दौड़ में हम अपनी प्रकृति के प्रति अपने कर्त्तव्य भूल गये हैं। निरन्तर वन कट रहे हैं,हरियाली कहीं दिखती नहीं, दूर-दूर तक कंक्रीट के जंगल ही जंगल दिखाई देते हैं, जिसका प्रभाव धीरे-धीरे दिखने लगा है - वर्षा कम होने लगी है,जहाँ हो रही है वहाँ बाढ़ ने तबाही मचा रखी है, पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ गया है, गर्मी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। परन्तु अभी भी इतनी देर नहीं हुई है, यदि मानव धरा के प्रति अपनी जिम्मेदारी को याद कर पूरी ईमानदारी से निभाने का संकल्प करे तो आने वाले पर्यावरणीय संकट से बचा जा सकता है।
मैंने इन पक्तियों में इन ही विचारों को शब्दबद्ध कर कहने की कोशिश की है -
वन संरक्षण को अपनाना है,
धरा को अपनी बचाना है।
वन ही जीवन का पर्याय है,
वन विनाश
धरा के साथ अन्याय है।
रोका न अगर
वनों का विनाश,
जीवन में सर्वत्र होगा
त्रास ही त्रास।
होगी कैसे बारिश
अगर पेड़ गये कट,
मत मूंदों अपनी आँखे
वन विनाश एक घोर संकट।
सूख जायेंगे
नदी और नाले सारे,
जाएेंगे कहाँ
जंगली जानवर बेचारे।
हे मंदबुद्धि मानव
अब तो जागो जरा,
वरना क्षमा न करेगी
तुमको ये जीवनदायिनी धरा।
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