चाहत

तुम्हारी चाहत में,
आज तक जीता आया हूँ,
न जाने क्यूँ तुम कोअपना
न बना पाया हूँ......

तुम्हारा वो
धीरे से पास आना,
हौले से मुस्कराना
दिल को बदहवास कर,
वापस लौट जाना
समझ न पाया हूँ.......

दिल को अपने मैं
अभी न संभाल पाया हूँ,
लेकिन पता नहीं क्यों
फिर भी तुम्हारी चाहत में
जीता आया हूँ.........
    

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