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धार्मिक कर्मकांड में आसन पर बैठने का महत्व

  भारतीय सनातन परंपरा में धार्मिक कर्मकांड , पूजा-पाठ , जप , ध्यान , हवन तथा साधना के समय बैठने के लिए “ आसन ” का विशेष महत्व बताया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने केवल पूजा की विधि ही नहीं बताई , बल्कि पूजा करते समय किस प्रकार बैठना चाहिए , किस दिशा में बैठना चाहिए और किस प्रकार का आसन उपयोग करना चाहिए - इन सभी बातों का भी विस्तार से वर्णन किया है। धार्मिक कार्यों में आसन पर बैठना केवल एक परंपरा ही नहीं , बल्कि आध्यात्मिक , वैज्ञानिक , मानसिक और शारीरिक दृष्टि से अत्यंत आवश्यक माना गया है। आसन का अर्थ “ आसन ” का सामान्य अर्थ होता है - बैठने का स्थान। धार्मिक दृष्टि से वह पवित्र वस्तु या स्थान जिस पर बैठकर व्यक्ति पूजा-पाठ , जप , ध्यान या साधना करता है , वह आसन कहलाता है। यह कुशा , ऊन , लकड़ी , चटाई , वस्त्र अथवा मृगछाला आदि से बना हो सकता है।   आसन केवल एक बैठने का ही माध्यम नहीं बल्कि इसका धार्मिक दृष्टि से भी कुछ अलग महत्व होता है जिसको निम्न प्रकार समझा जा सकता है-   ऊर्जा का संरक्षण धर्मशास्त्रों के अनुसार जब व्यक्ति पूजा या मंत्रजप करता है , तब उसके भीतर एक विशेष प्रका...

सूर्योपासना का महत्त्व

  हमारी भारती य संस्कृति में सूर्य देव को विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें प्रत्यक्ष देवता कहा गया है , क्योंकि वे हमें प्रतिदिन दिखाई देते हैं और समस्त जीवन के आधार हैं। सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। वे हमें प्रकाश , ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। सूर्योपनिषद के अनुसार, समस्त देव, गंधर्व और ऋषि सूर्य रश्मियों में निवास करते हैं। स्कंदपुराण में कहा गया है कि सूर्य को अर्ध्य दिए बिना भोजन करना पाप के समान है। ब्रह्मपुराण के अध्याय 29-30 में सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता मानते हुए सभी देवों को इनका प्रकाश स्वरूप बताया गया है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में प्रकृति की उपासना का विशेष स्थान रहा है और इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है सूर्योपासना जिसमें सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है , जिसे अर्घ्य देना कहा जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और आज भी लोग श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इसका पालन करते हैं। अर्घ्य देना केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है , बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व भी छिपा हुआ है। कुल मिलाकर हम यह स्वीक...

किसी से अपनी तुलना न करें — आत्मसम्मान और प्रगति का मूल मंत्र

  आज के समय में, जहाँ सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही है, लोग अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं। किसी की सफलता, किसी का रूप, किसी की संपत्ति या जीवनशैली देखकर हम अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। लेकिन सच यह है कि  अपनी तुलना दूसरों से करना न केवल गलत है, बल्कि यह हमारे आत्मविश्वास और मानसिक शांति को भी नुकसान पहुँचाता है।   जब हम दूसरों की उपलब्धियों को देखकर उससे अपनी तुलना करते हैं, तो भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति अलग होता है। हर किसी की सोच, क्षमता, परिस्थितियाँ और जीवन का उद्देश्य अलग होता है। हमें लगता है कि हम पीछे हैं। यह भावना धीरे-धीरे हमारे आत्मविश्वास को कम कर देती है।  इस संबंध में एक कहानी अत्यंत प्रासंगिक है। जंगल में एक कौआ रहता था और वह अपने जीवन से बिल्कुल संतुष्ट था। लेकिन एक दिन उसे एक हंस दिखाई दिया। हंस को देखकर कौआ सोचने लगा कि यह हंस तो बहुत सफ़ेद है और मैं बहुत काला हूँ। यह हंस अवश्य ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा। उसने हंस से अपने विचार व्यक्त किये। हंस ने उत्तर दिया कि क्या तुमको वास्तव में ऐसा लगता है। ऐ...

उत्थान और पतन: जीवन का अनिवार्य सत्य

  जीवन एक सतत यात्रा है, जिसमें उत्थान और पतन  दोनों ही अनिवार्य स्थिति हैं। यह प्रकृति का नियम है कि हर ऊँचाई के बाद एक गिरावट आती है और हर गिरावट के बाद फिर से उठने का अवसर मिलता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और संतुलन प्राप्त करता है। उत्थान हमें गर्व, आत्मविश्वास और खुशी देता है। जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं या सफलता की ऊँचाइयों को छूते हैं, तो हमें लगता है कि हमने सब कुछ हासिल कर लिया। लेकिन इसी समय हमें सबसे अधिक सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योंकि अहंकार और लापरवाही अक्सर पतन का कारण बनते हैं। सफलता के क्षणों में विनम्रता बनाए रखना ही सच्चे विजेता की पहचान है। दूसरी ओर, पतन जीवन का वह चरण है जो हमें परखता है। असफलता, हार या कठिनाइयाँ हमें कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें मजबूत और अनुभवी बनाती हैं। जब हम गिरते हैं, तभी हमें अपनी गलतियों का एहसास होता है और सुधार का अवसर मिलता है। पतन हमें यह सिखाता है कि धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने पतन से सीख ली, उन्होंने ही महान उत्थान किय...

मन की शक्ति

मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे शक्तिशाली तत्व है , तो वह उसका मन है। मन ही हमें ऊँचाइयों तक ले जाता है और मन ही हमें गहराइयों में धकेल देता है। शरीर की शक्ति सीमित होती है , लेकिन मन की शक्ति असीम होती है। इसलिए जीवन में सफलता , संतुलन और शांति पाने के लिए सबसे पहले अपने मन को सशक्त बनाना आवश्यक है। मन की कमजोरी ही हमारे अधिकांश दुःखों का कारण बनती है। जब हम परिस्थितियों से डर जाते हैं ,   दूसरों की बातों से टूट जाते हैं , और असफलता से घबरा जाते हैं—तब वास्तव में हमारी हार बाहर से नहीं , बल्कि भीतर से होती है। इसके विपरीत , यदि मन दृढ़ हो , तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी हमारे आगे झुक जाती हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने मन को मजबूत बनाया , उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। मन को सशक्त बनाने का पहला उपाय है—सकारात्मक सोच। विचार ही हमारे मन का निर्माण करते हैं। यदि हम हर परिस्थिति में नकारात्मक पहलू ही देखते रहेंगे , तो मन कमजोर होता जाएगा। लेकिन यदि हम हर कठिनाई में अवसर खोजने की आदत डाल लें , तो हमारा मन धीरे-धीरे मजबूत होने लगेगा। सकारात्मक सोच का अर्थ यह नहीं कि समस्...

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं… एक एहसास है

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कभी सोचा है… हम हिंदी सिर्फ बोलते नहीं, बल्कि जीते हैं? भारत की प्यारी भाषा है हिंदी, जग में सबसे न्यारी भाषा है हिंदी। जन-जन की भाषा है हिंदी, हिंद को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है हिंदी। कालजयी जीवनरेखा है हिंदी, जीवन की परिभाषा है हिंदी। हिंदी की बुलंद ललकार से ही हमने आज़ादी पाई,  हर देशवासी की इसमें भावना समाई। इसके मीठे बोलों में ऐसी शक्ति है, जो अपने ही नहीं, परायों को भी अपना बना लेती है। हर भाषा को अपनी सखी-सहेली मानती है, ऐसी है हमारी अनूठी, अलबेली हिंदी। संस्कृत से निकलती है हिंदी की धारा, भारतेंदु और जयशंकर ने इसे दुलारा। जहाँ निराला और महादेवी ने इसे संवारा, वहीं दिनकर और सुभद्रा ने इसे निखारा। ऐसे महापुरुषों की प्यारी है हिंदी, हिंद का गर्व है हिंदी। लेकिन विडंबना देखिए… हम हिंदी को अपनी धरोहर मानते हैं, फिर भी उसे बोलने में सकुचाते हैं। विदेशी भाषा बोलना हमें गर्व लगता है, और अपनी भाषा कहीं पीछे छूट जाती है। जबकि आज तो विदेशी भी “हरे रामा, हरे कृष्णा” बोलकर हिंदी संस्कृति के रंग में रंग जाते हैं। तत्सम, तद्भव, देशी-विदेशी— हर रंग को अपनाती है हिंदी...

जब पेड़ थे… तब ज़िंदगी भी थी

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मुझे याद आते हैं वो दिन… जब हवा सुहानी बालों से खेल जाती थी, हर घर-आँगन में हरियाली होती थी, और हर सुबह चिड़ियाँ चहचहाकर हमें जगाती थीं। पर अब… पेड़ों के कट जाने से वो मीठा सपना टूट गया है। अब न चिड़ियों की वो चहचहाहट सुनाई देती है, न मिट्टी की वो सौंधी खुशबू महसूस होती है। धरती माता भी जैसे प्यासी हो गई है, न बादल पहले जैसे गरजते हैं, न वैसे बरसते हैं। सोचिए… अगर वनों का विनाश यूँ ही चलता रहा, तो जीवन में त्रास ही त्रास रह जाएगा। अगर पेड़ ही नहीं रहेंगे, तो बारिश कहाँ से आएगी? नदी-नाले सूख जाएँगे, और पशु-पक्षी कहाँ जाएँगे? अब समय आ गया है… हमें रुकना होगा, सोचना होगा, और इस विनाश को रोकना होगा। हे मानव, अब तो जागो ज़रा… वरना ये जीवनदायिनी धरा हमें कभी क्षमा नहीं करेगी। पेड़ों से प्यार करो, उन्हें अपना मित्र समझो। पेड़ लगाकर, तुम सिर्फ प्रकृति का नहीं, बल्कि अपना ही उपकार करोगे।

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