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उत्थान और पतन: जीवन का अनिवार्य सत्य

  जीवन एक सतत यात्रा है, जिसमें उत्थान और पतन  दोनों ही अनिवार्य स्थिति हैं। यह प्रकृति का नियम है कि हर ऊँचाई के बाद एक गिरावट आती है और हर गिरावट के बाद फिर से उठने का अवसर मिलता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और संतुलन प्राप्त करता है। उत्थान हमें गर्व, आत्मविश्वास और खुशी देता है। जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं या सफलता की ऊँचाइयों को छूते हैं, तो हमें लगता है कि हमने सब कुछ हासिल कर लिया। लेकिन इसी समय हमें सबसे अधिक सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योंकि अहंकार और लापरवाही अक्सर पतन का कारण बनते हैं। सफलता के क्षणों में विनम्रता बनाए रखना ही सच्चे विजेता की पहचान है। दूसरी ओर, पतन जीवन का वह चरण है जो हमें परखता है। असफलता, हार या कठिनाइयाँ हमें कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें मजबूत और अनुभवी बनाती हैं। जब हम गिरते हैं, तभी हमें अपनी गलतियों का एहसास होता है और सुधार का अवसर मिलता है। पतन हमें यह सिखाता है कि धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने पतन से सीख ली, उन्होंने ही महान उत्थान किय...

मन की शक्ति

मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे शक्तिशाली तत्व है , तो वह उसका मन है। मन ही हमें ऊँचाइयों तक ले जाता है और मन ही हमें गहराइयों में धकेल देता है। शरीर की शक्ति सीमित होती है , लेकिन मन की शक्ति असीम होती है। इसलिए जीवन में सफलता , संतुलन और शांति पाने के लिए सबसे पहले अपने मन को सशक्त बनाना आवश्यक है। मन की कमजोरी ही हमारे अधिकांश दुःखों का कारण बनती है। जब हम परिस्थितियों से डर जाते हैं ,   दूसरों की बातों से टूट जाते हैं , और असफलता से घबरा जाते हैं—तब वास्तव में हमारी हार बाहर से नहीं , बल्कि भीतर से होती है। इसके विपरीत , यदि मन दृढ़ हो , तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी हमारे आगे झुक जाती हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने मन को मजबूत बनाया , उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। मन को सशक्त बनाने का पहला उपाय है—सकारात्मक सोच। विचार ही हमारे मन का निर्माण करते हैं। यदि हम हर परिस्थिति में नकारात्मक पहलू ही देखते रहेंगे , तो मन कमजोर होता जाएगा। लेकिन यदि हम हर कठिनाई में अवसर खोजने की आदत डाल लें , तो हमारा मन धीरे-धीरे मजबूत होने लगेगा। सकारात्मक सोच का अर्थ यह नहीं कि समस्...

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं… एक एहसास है

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कभी सोचा है… हम हिंदी सिर्फ बोलते नहीं, बल्कि जीते हैं? भारत की प्यारी भाषा है हिंदी, जग में सबसे न्यारी भाषा है हिंदी। जन-जन की भाषा है हिंदी, हिंद को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है हिंदी। कालजयी जीवनरेखा है हिंदी, जीवन की परिभाषा है हिंदी। हिंदी की बुलंद ललकार से ही हमने आज़ादी पाई,  हर देशवासी की इसमें भावना समाई। इसके मीठे बोलों में ऐसी शक्ति है, जो अपने ही नहीं, परायों को भी अपना बना लेती है। हर भाषा को अपनी सखी-सहेली मानती है, ऐसी है हमारी अनूठी, अलबेली हिंदी। संस्कृत से निकलती है हिंदी की धारा, भारतेंदु और जयशंकर ने इसे दुलारा। जहाँ निराला और महादेवी ने इसे संवारा, वहीं दिनकर और सुभद्रा ने इसे निखारा। ऐसे महापुरुषों की प्यारी है हिंदी, हिंद का गर्व है हिंदी। लेकिन विडंबना देखिए… हम हिंदी को अपनी धरोहर मानते हैं, फिर भी उसे बोलने में सकुचाते हैं। विदेशी भाषा बोलना हमें गर्व लगता है, और अपनी भाषा कहीं पीछे छूट जाती है। जबकि आज तो विदेशी भी “हरे रामा, हरे कृष्णा” बोलकर हिंदी संस्कृति के रंग में रंग जाते हैं। तत्सम, तद्भव, देशी-विदेशी— हर रंग को अपनाती है हिंदी...

जब पेड़ थे… तब ज़िंदगी भी थी

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मुझे याद आते हैं वो दिन… जब हवा सुहानी बालों से खेल जाती थी, हर घर-आँगन में हरियाली होती थी, और हर सुबह चिड़ियाँ चहचहाकर हमें जगाती थीं। पर अब… पेड़ों के कट जाने से वो मीठा सपना टूट गया है। अब न चिड़ियों की वो चहचहाहट सुनाई देती है, न मिट्टी की वो सौंधी खुशबू महसूस होती है। धरती माता भी जैसे प्यासी हो गई है, न बादल पहले जैसे गरजते हैं, न वैसे बरसते हैं। सोचिए… अगर वनों का विनाश यूँ ही चलता रहा, तो जीवन में त्रास ही त्रास रह जाएगा। अगर पेड़ ही नहीं रहेंगे, तो बारिश कहाँ से आएगी? नदी-नाले सूख जाएँगे, और पशु-पक्षी कहाँ जाएँगे? अब समय आ गया है… हमें रुकना होगा, सोचना होगा, और इस विनाश को रोकना होगा। हे मानव, अब तो जागो ज़रा… वरना ये जीवनदायिनी धरा हमें कभी क्षमा नहीं करेगी। पेड़ों से प्यार करो, उन्हें अपना मित्र समझो। पेड़ लगाकर, तुम सिर्फ प्रकृति का नहीं, बल्कि अपना ही उपकार करोगे।

धरा पर स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ!

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बेटियाँ बोझ नहीं होतीं… ‘नवयुग’ यही कहता है। खुशियाँ लुटाती हैं, दुःख-दर्द को अपने दिल में समेट लेती हैं। हर रिश्ते को सहेजकर रखने वाली, इसलिए तो ‘धारिणी’ कहलाती हैं बेटियाँ। बेटियाँ अब सहारा बन गई हैं… जैसे सुबह का सूरज नई उम्मीद देता है, वैसे ही बेटियाँ हर घर को रोशन करती हैं। जलती-तपती भी हैं, और शाम की ठंडक बनकर सुकून भी देती हैं। किसी से कम नहीं हैं बेटियाँ। देखो तो सही… हर कर्तव्य निभा रही हैं बेटियाँ। कहीं मीरा की भक्ति, कहीं लक्ष्मी की समृद्धि, कहीं दुर्गा की शक्ति, तो कहीं सरस्वती की बुद्धि बनकर हर रूप में नज़र आती हैं बेटियाँ। नदी की धारा सी बहती हैं, मशाल की तरह जलती हैं। सूरज की लालिमा भी हैं, और हवा की खुशबू भी। आसमान में सितारों सी जगमगाती हुई, धरती को स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ।

हमारी अनूठी-अलबेली हिन्दी

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हिन्दी भाषा की आओ, तुमको पहचान कराएँ, अपनाकर इसे हम अपना, जीवन सफल बनाएँ।   हिन्दी नहीं किसी की दासी, हिन्दी है गंगा का पानी, हिन्दी है भारत की भाषा, हिन्दी भारत की रानी।   हिन्दी शक्ति रूप है, कर लो इसको नमन, शिव से इसे चन्द्र मिला, ओम नाम उच्चारण।   बह्मा जी के वेदों में, जब संस्कृत उच्चारण आया, हिन्दी के साथ मिलकर सुन्दर शब्द बनाया, वेद, पुराण और गीता पढ़कर, सब प्राणियों ने जीवन सुखद बनाया।   भारत में ही जन्मी हिन्दी, भारत में ही परवान चढ़ी, भारत इसका घर-आंगन है, नहीं किसी से कभी लड़ी।   बिन्दी लगा आदर्श बनी, यूँ भारत देश की नारी, पूरा देश अपनाए इसको, हुई अंग्रेजों पर ये भारी।   सबको गले लगाकर चलती, करती सबकी अगवानी, याचक नहीं, नहीं है आश्रित, सदा सनातन अवढ़रदानी।   खेतों खलियानों की बोली,आँगन-आँगन की रंगोली, सत्यम्-शिवम्-सरलतम्-सुन्दर, पूजा की यह चंदन रोली, जन-जन की भाषा यह, कण-कण की वाणी कल्याणी।   भूख नहीं है इसे राज की, प्यास नहीं इसे ताज की, करती आठों पहर तपस्या, रचना करती नव समाज की।   समय आ गया है, उठो, जागो और संकल्प करो, अ...

बेटियों की डोलियाँ क्यों उठती हैं

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बिटिया है मेरी, जन्मी थी जब लगा जैसे नन्ही सी एक परी सुनहरे रंगो में रंगे आसमां से उतरी हो, जैसे सतरंगी आसमानी महकते फूलों की कली।   फुदकती थी हमेशा मेरे काँधे पर यूं ही गौरैया की तरह, नन्हे-नन्हे हाथों से दुलारती, पुचकारती, कलोल करती, उछलती कूदती घूमती घर भर में नन्ही सी परी।   न जाने कब समय ने छीन लिया  उसका चहकना, नन्हे-नन्हें कदमों में बंधी छम-छम पायल का छनकना दो चाँदी जैसे दाँतों से प्यार से काटना, मेरे पेट पर ही लेटे-लेटे सो जाना, वो घर में रौनक-रोशनी का बिखेरना। कद क्या बढ़ा, जैसे जिम्मेदार हो गई, कब बड़ी हो गई, समझदार हो गई। जिसकी गोद में पली, उसे ही ज्ञान देने लगी माता पिता के स्वास्थ्य पर ध्यान देने लगी, अपने आदर्श मुझमें ही टटोलने लगी मेरी हर अच्छाई की नकल करने लगी।   बेटियों की डोलियाँ क्यों उठती हैं? सदा के लिए चली जाती हैं पराए अनजान द्वार, बन जाती हैं अजनबी किसी और घर की पहचान।   यही है सब परियों की कहानी, सोचते तो हैं सभी कि परी अपने आसमां में रहे, अपने तारे चुने, सपने बुने, स्वावलंबी बने, आत्म सम्मानी बने, क्यों छोड़े घर बाबुल का अपने क्यों न साथ...

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