धार्मिक कर्मकांड में आसन पर बैठने का महत्व
भारतीय सनातन परंपरा में धार्मिक कर्मकांड, पूजा-पाठ, जप, ध्यान, हवन तथा साधना के समय बैठने के लिए “आसन” का विशेष महत्व बताया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने केवल पूजा की विधि ही नहीं बताई, बल्कि पूजा करते समय किस प्रकार बैठना चाहिए, किस दिशा में बैठना चाहिए और किस प्रकार का आसन उपयोग करना चाहिए - इन सभी बातों का भी विस्तार से वर्णन किया है। धार्मिक कार्यों में आसन पर बैठना केवल एक परंपरा ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, मानसिक और शारीरिक दृष्टि से अत्यंत आवश्यक माना गया है।
आसन का अर्थ
“आसन” का सामान्य अर्थ होता है - बैठने का स्थान। धार्मिक दृष्टि से वह पवित्र वस्तु या स्थान जिस पर बैठकर व्यक्ति पूजा-पाठ, जप, ध्यान या साधना करता है, वह आसन कहलाता है। यह कुशा, ऊन, लकड़ी, चटाई, वस्त्र अथवा मृगछाला आदि से बना हो सकता है।
आसन केवल एक बैठने का ही माध्यम नहीं बल्कि इसका धार्मिक दृष्टि से भी कुछ अलग महत्व होता है जिसको निम्न प्रकार समझा जा सकता है-
ऊर्जा का संरक्षण
धर्मशास्त्रों के अनुसार जब व्यक्ति पूजा या मंत्रजप करता है, तब उसके भीतर एक विशेष प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यदि वह सीधे भूमि पर बैठता है, तो यह ऊर्जा धरती में चली जाती है। आसन उस ऊर्जा को सुरक्षित रखने का कार्य करता है। इस कारण साधक की एकाग्रता और साधना की शक्ति बनी रहती है।
पवित्रता की भावना
पूजा या मंत्रजप करते समय आसन व्यक्ति को यह अनुभव कराता है कि वह एक विशेष और पवित्र कार्य कर रहा है। जैसे मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धा जागती है, उसी प्रकार आसन पर बैठते ही मन पूजा और ईश्वर-चिंतन में लगने लगता है। यह मानसिक शुद्धि और अनुशासन का प्रतीक है।
मन की एकाग्रता
पूजा, मंत्रजप या अन्य कोई धार्मिक कार्य करते समय मन का स्थिर होना अत्यंत आवश्यक है। आसन पर स्थिर होकर बैठने से शरीर कम हिलता-डुलता है, जिससे मन भी शांत और एकाग्र रहता है। यही कारण है कि योग और ध्यान में भी स्थिर आसन को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।
देवताओं का सम्मान
शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा के समय शुद्ध और उचित आसन का प्रयोग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करता है। जिस प्रकार अतिथि के लिए आसन की व्यवस्था की जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की उपासना भी आदरपूर्वक की जानी चाहिए।
धार्मिक महत्व के अलावा आसन पर बैठने के कुछ वैज्ञानिक महत्व भी होते हैं जो निम्न प्रकार हैं-
शरीर को स्थिरता मिलती है
जब व्यक्ति किसी उचित आसन पर बैठता है, तो रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है। इससे शरीर में रक्तसंचार संतुलित रहता है और लंबे समय तक बैठने में कठिनाई नहीं होती।
पृथ्वी के प्रभाव से सुरक्षा
वैज्ञानिक दृष्टि से धरती विद्युत और चुंबकीय तरंगों का बड़ा स्रोत है। ऊन, कुशा या लकड़ी का आसन शरीर को सीधे धरती के संपर्क से बचाता है, जिससे शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा संतुलित बनी रहती है।
मानसिक शांति
एक निश्चित आसन पर प्रतिदिन पूजा करने से मस्तिष्क उस स्थान को शांति और ध्यान से जोड़ लेता है। इससे बैठते ही मन शांत होने लगता है और तनाव कम होता है।
विभिन्न प्रकार के आसनों का महत्व
कुशा का आसन
कुशा के आसन को सबसे पवित्र माना गया है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा को स्थिर रखने में सहायक माना जाता है।
ऊन का आसन
ऊन का आसन विशेष रूप से ध्यान और मंत्रजप के लिए उत्तम माना जाता है। यह शरीर की ऊर्जा को सुरक्षित रखता है।
मृगछाला
प्राचीन ऋषि-मुनि मृगछाला का प्रयोग करते थे। यह वैराग्य और साधना का प्रतीक माना जाता था।
सूती वस्त्र का आसन
सामान्य पूजा-पाठ के लिए स्वच्छ सूती वस्त्र का आसन भी उपयोगी माना गया है।
शास्त्रों में आसन का उल्लेख
योगशास्त्रों में भी आसन की स्थिरता को साधना की सफलता का आधार माना गया है। ब्रह्मांड पुराण तंत्रसार में कहा गया है कि धार्मिक कर्मकांडों के लिए भूमि पर बैठने से दुःख, पत्थर पर बैठने से रोग, पत्तों पर बैठने से चित्तभ्रम, लकड़ी पर बैठने से दुर्भाग्य, घास फूस पर बैठने से अपयश, कपड़े पर बैठने से तपस्या में हानि और बांस पर बैठने से दरिद्रता आती है। भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग का वर्णन करते हुए कहा है कि साधक को स्वच्छ स्थान पर उचित आसन बिछाकर स्थिर होकर बैठना चाहिए।
आसन से जुड़ी आवश्यक सावधानियाँ
- पूजा का आसन सदैव स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए।
- आसन को दूसरों के उपयोग से बचाना चाहिए।
- फटा या गंदा आसन उपयोग नहीं करना चाहिए।
- पूजा के बाद आसन को सम्मानपूर्वक सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
कह सकते हैं कि धार्मिक कर्मकांड के समय आसन पर बैठना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, मानसिक एकाग्रता, शारीरिक स्थिरता और पवित्रता से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है। हमारे ऋषियों ने गहन अनुभव और वैज्ञानिक सोच के आधार पर आसन की व्यवस्था बनाई थी। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पूजा, जप, ध्यान और धार्मिक अनुष्ठानों के समय उचित आसन का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इससे साधना में सफलता, मन में शांति और जीवन में सकारात्मकता प्राप्त होती है।
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