हिंदी साहित्य का बदलता स्वरुप




साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। प्रत्येक युग का उत्कृष्ट साहित्य समाज के प्रगतिशील विचारों से प्रभावित होता रहा है। साहित्य के निर्माण में समाज का बहुत बड़ा योगदान रहता है। समाज में होने वाले परिवर्तनों का साहित्य पर निरन्तर प्रभाव पड़ता है तथा समाज के साथ साहित्य में भी परिवर्तन आता रहता है।

हिंदी साहित्य के स्वरूप में भी वर्तमान समय की आवश्यकताओं, परिस्थितयों के अनुसार परिवर्तन होता गया। हिन्दी साहित्य के बदलते रूप को चार भागों में विभाजित कर आसानी से समझा जा सकता है।

वीरगाथाकाल में कवि किसी न किसी राजा के आश्रय में रहते थे। उनके शौर्य, पराक्रम और प्रताप का वर्णन करना इन का स्वाभाविक गुण था, अतः समाज की आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुकूल ही प्रायः वीरों की गाथाओं, युद्धों के सजीव वर्णन, वीर रस से ओतप्रोत मुक्तक एवं प्रबंध काव्यों की रचना हुई। बीसलदेव रासो, खुमान रासो व पृथ्वीराज रासो इस समय की मुख्य रचनाएं हैं।

वीरगाथाकाल की विभीषिका तथा लगातार मुसलमानों के आक्रमण से जनता को परेशानी एवं विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। मंदिरों में मूर्तियों को तोड़ा गया तथा धर्मग्रन्थ जलाए गए। ऐसे में मानव शांति की खोज में भटकने लगा, फलतः देश में ईश्वर भक्ति की लहर दौड़ने लगी। इसलिए हिन्दी साहित्य में इस समय को भक्ति काल के नाम से जाना जाता है। कविवर रहीम, सूर, तुलसी, जायसी, मीरा, रसखान आदि जैसे महान कवि इसी समय हुए जिन्होंने धार्मिक भावनाओं से ओत- प्रोत कविताओं, छंदों आदि के माध्यम से समाज के सम्मुख वैचारिक क्रांति को जन्म दिया। इनकी रचनाओं में मुख्य रूप से सगुण तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना, गुरू की महिमा, बाह्याडम्बरों का विरोध, ईश्वर के नाम की महिमा, मानवतावादी धर्म की महत्ता व कविता में स्वान्तः सुखाय की भावना का चित्रण मिलता है। इस समय  साहित्य में अवधी व ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया। ‘पद्मावत’ व ‘रामचरितमानस’ जैसे महाकाव्यों की रचना हुई।

इस के पश्चात, रीतिकाल की रचनाएं अधिकतर दरबारी थी। इसमें श्रृगांर की प्रधानता रही। मुख्यतया कवित्त, सवैये और दोहे लिखे गये अर्थात् मुक्तक रचनाएं लिखी गयीं। ऐहलौकिकता, श्रृंगारिकता, नायिकाभेद और अलंकार-प्रियता इस युग की प्रमुख विशेषताएं हैं। प्रायः सब कवियों ने ब्रज-भाषा का प्रयोग किया है। भूषण कवि ने वीर रस की रचनाएं भी दीं। भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष अधिक समृद्ध रहा। शब्द-शक्ति पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, न नाटयशास्त्र का विवेचन किया गया। विषयों का संकोच हो गया और मौलिकता का हास होने लगा।
इस समय अनेक कवि हुएकेशवदास, चिंतामणि, देव, बिहारी, मतिराम, भूषण, घनानंद, पद्माकर आदि। बिहारी ने दोहों की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित कर दिया। केशव, बिहारी और भूषण इस युग के प्रतिनिधि कवि माने जा सकते हैं।

‘आधुनिक काल’ तक आते-आते हिन्दी साहित्य में काफी बदलाव आ गया...अब ब्रजभाषा, अवधी के साथ ही खड़ी बोली का वर्चस्व स्थापित हो गया व गद्य –पद्य दोनों में रचनाएं होने लगीं। विषय की दृष्टि से भी व्यापकता आयी। अब राजनैतिक चेतना, समाजसुधार की भावना, आध्यात्मवाद का संदेश आदि विषयों पर लिखा जाने लगा। साथ ही गद्य की विविध विधाओं - उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, आलोचना का उद्भव और विकास हुआ, जिनमें जीवन की समस्याओं और संघषों का चित्रण मिलता है। भोगे हुए जीवन का वास्तविक चित्र हमारे सामने प्रस्तुत होता है। दोनों धाराओं में आधुनिक साहित्य के रूप परिवर्तित होता रहा है।
अतः हम देख सकते हैं कि किस प्रकार हिन्दी साहित्य अनेक परिवर्तनों के दौर से गुजरता हुआ आगे बढ़ा व नित नवीन व समृद्ध होता रहा है...आने वाले समय में भी इस का स्वरूप समयानुसार बदलता ही रहेगा।   





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