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हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं… एक एहसास है

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कभी सोचा है… हम हिंदी सिर्फ बोलते नहीं, बल्कि जीते हैं? भारत की प्यारी भाषा है हिंदी, जग में सबसे न्यारी भाषा है हिंदी। जन-जन की भाषा है हिंदी, हिंद को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है हिंदी। कालजयी जीवनरेखा है हिंदी, जीवन की परिभाषा है हिंदी। हिंदी की बुलंद ललकार से ही हमने आज़ादी पाई,  हर देशवासी की इसमें भावना समाई। इसके मीठे बोलों में ऐसी शक्ति है, जो अपने ही नहीं, परायों को भी अपना बना लेती है। हर भाषा को अपनी सखी-सहेली मानती है, ऐसी है हमारी अनूठी, अलबेली हिंदी। संस्कृत से निकलती है हिंदी की धारा, भारतेंदु और जयशंकर ने इसे दुलारा। जहाँ निराला और महादेवी ने इसे संवारा, वहीं दिनकर और सुभद्रा ने इसे निखारा। ऐसे महापुरुषों की प्यारी है हिंदी, हिंद का गर्व है हिंदी। लेकिन विडंबना देखिए… हम हिंदी को अपनी धरोहर मानते हैं, फिर भी उसे बोलने में सकुचाते हैं। विदेशी भाषा बोलना हमें गर्व लगता है, और अपनी भाषा कहीं पीछे छूट जाती है। जबकि आज तो विदेशी भी “हरे रामा, हरे कृष्णा” बोलकर हिंदी संस्कृति के रंग में रंग जाते हैं। तत्सम, तद्भव, देशी-विदेशी— हर रंग को अपनाती है हिंदी...

हमारी अनूठी-अलबेली हिन्दी

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हिन्दी भाषा की आओ, तुमको पहचान कराएँ, अपनाकर इसे हम अपना, जीवन सफल बनाएँ।   हिन्दी नहीं किसी की दासी, हिन्दी है गंगा का पानी, हिन्दी है भारत की भाषा, हिन्दी भारत की रानी।   हिन्दी शक्ति रूप है, कर लो इसको नमन, शिव से इसे चन्द्र मिला, ओम नाम उच्चारण।   बह्मा जी के वेदों में, जब संस्कृत उच्चारण आया, हिन्दी के साथ मिलकर सुन्दर शब्द बनाया, वेद, पुराण और गीता पढ़कर, सब प्राणियों ने जीवन सुखद बनाया।   भारत में ही जन्मी हिन्दी, भारत में ही परवान चढ़ी, भारत इसका घर-आंगन है, नहीं किसी से कभी लड़ी।   बिन्दी लगा आदर्श बनी, यूँ भारत देश की नारी, पूरा देश अपनाए इसको, हुई अंग्रेजों पर ये भारी।   सबको गले लगाकर चलती, करती सबकी अगवानी, याचक नहीं, नहीं है आश्रित, सदा सनातन अवढ़रदानी।   खेतों खलियानों की बोली,आँगन-आँगन की रंगोली, सत्यम्-शिवम्-सरलतम्-सुन्दर, पूजा की यह चंदन रोली, जन-जन की भाषा यह, कण-कण की वाणी कल्याणी।   भूख नहीं है इसे राज की, प्यास नहीं इसे ताज की, करती आठों पहर तपस्या, रचना करती नव समाज की।   समय आ गया है, उठो, जागो और संकल्प करो, अ...

भारत की अन्तरिक्ष यात्रा!

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 “तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस पार क्या है, जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है।” कवियत्री महादेवी वर्मा की यह पंक्तियां प्रमाणित करती हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव अंतरिक्ष की रोमांचक कल्पनाएँ करता रहा है। इन रोमांचक कल्पनाओं में अंतरिक्ष कभी आध्यात्म का विषय बना तो कभी कविताओं और दंत-कथाओं का। पारलौकिकतावाद से प्रभावित होकर कभी मानव ने अपनी कल्पना के स्वर्ग और नरक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिये तो कभी मानवतावाद के प्रभाव में आकर पृथ्वी को केंद्र में रखा और अंतरिक्ष को उसकी परिधि मान लिया। धीरे-धीरे जब सभ्यता और समझ विकसित हुई तो मानव ने अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने के लिये प्रेक्षण यंत्र बनाएँ, जिनमें दूरबीनें प्रमुख थीं। इसके बाद प्रारम्भ हुआ विज्ञान के माध्यम से अंतरिक्ष को समझने का प्रयास।  इस क्रम में आर्यभट्ट से लेकर गैलीलियो, कॉपरनिकस, भास्कर एवं न्यूटन तक प्रयास होते रहे। न्यूटन के बाद आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान का विकास हुआ, जो आज इतना परिपक्व हो गया है कि हम मानव को अंतरिक्ष में भेजने के साथ अंतरिक्ष पर्यटन एवं अंतरिक्ष कॉलोनियाँ बसाने की भी कल्पना कर...

वसन्त का मानवीकरण....महावर !!

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अंगशुची , मंजन , वसन , मांग , महावर , केश। तिलक भाल , तिल चिबुक में , भूषण मेंहदी वेश।। मिस्सी काजल अरगजा , वीरी और सुगंध। अर्थात अंगों में उबटन लगाना , स्नान करना , स्वच्छ वस्त्र धारण करना , मांग भरना , महावर लगाना , बाल संवारना , तिलक लगाना , ठोढी़ पर तिल बनाना , आभूषण धारण करना , मेंहदी रचाना , दांतों में मिस्सी , आंखों में काजल लगाना , सुगांधित द्रव्यों का प्रयोग , पान खाना , माला पहनना , नीला कमल धारण करना सौभाग्य स्त्रियों के लिए शास्त्रों में बताया गया है। हिन्दू धर्म में छोटे - बड़े सभी प्रकार के शुभ कार्य महावर के बिना शुरू नहीं होते है। भारत में विवाह , त्योहार , पूजा आदि शुभकार्यों में पैरों में महावर लगाने का प्रचलन है। महावर को ‘ आलता ’ व ‘ जावक ’ भी कहा जाता है। यह लाल रंग का तरल पदार्थ होता है   जिसे महिलायें पायल और बिछिया पहनने के साथ ही अपने पैरों में लगाती हैं। महावर या आलता लगाने से महिलाओं के पैर और भी अधिक खूबसूरत लगने लगते है। ब...

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