जब पेड़ थे… तब ज़िंदगी भी थी


मुझे याद आते हैं वो दिन…
जब हवा सुहानी बालों से खेल जाती थी,
हर घर-आँगन में हरियाली होती थी,
और हर सुबह चिड़ियाँ चहचहाकर हमें जगाती थीं।

पर अब…
पेड़ों के कट जाने से वो मीठा सपना टूट गया है।

अब न चिड़ियों की वो चहचहाहट सुनाई देती है,
न मिट्टी की वो सौंधी खुशबू महसूस होती है।

धरती माता भी जैसे प्यासी हो गई है,
न बादल पहले जैसे गरजते हैं,
न वैसे बरसते हैं।

सोचिए…
अगर वनों का विनाश यूँ ही चलता रहा,
तो जीवन में त्रास ही त्रास रह जाएगा।

अगर पेड़ ही नहीं रहेंगे,
तो बारिश कहाँ से आएगी?

नदी-नाले सूख जाएँगे,
और पशु-पक्षी कहाँ जाएँगे?

अब समय आ गया है…
हमें रुकना होगा, सोचना होगा,
और इस विनाश को रोकना होगा।

हे मानव, अब तो जागो ज़रा…
वरना ये जीवनदायिनी धरा हमें कभी क्षमा नहीं करेगी।

पेड़ों से प्यार करो,
उन्हें अपना मित्र समझो।

पेड़ लगाकर,
तुम सिर्फ प्रकृति का नहीं,
बल्कि अपना ही उपकार करोगे।

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