धरा पर स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ!


बेटियाँ बोझ नहीं होतीं…

‘नवयुग’ यही कहता है।

खुशियाँ लुटाती हैं,
दुःख-दर्द को अपने दिल में समेट लेती हैं।

हर रिश्ते को सहेजकर रखने वाली,
इसलिए तो ‘धारिणी’ कहलाती हैं बेटियाँ।

बेटियाँ अब सहारा बन गई हैं…
जैसे सुबह का सूरज नई उम्मीद देता है,
वैसे ही बेटियाँ हर घर को रोशन करती हैं।

जलती-तपती भी हैं,
और शाम की ठंडक बनकर सुकून भी देती हैं।

किसी से कम नहीं हैं बेटियाँ।

देखो तो सही…
हर कर्तव्य निभा रही हैं बेटियाँ।

कहीं मीरा की भक्ति,
कहीं लक्ष्मी की समृद्धि,
कहीं दुर्गा की शक्ति,
तो कहीं सरस्वती की बुद्धि बनकर
हर रूप में नज़र आती हैं बेटियाँ।



नदी की धारा सी बहती हैं,
मशाल की तरह जलती हैं।

सूरज की लालिमा भी हैं,
और हवा की खुशबू भी।

आसमान में सितारों सी जगमगाती हुई,
धरती को स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ।

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