"चलता है".....आखिर कब तक?

कल प्रधानमंत्री मोदीजी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले से अपने भाषण में एक बात कही- “चलता है की जगह अब बदल गया का जमाना लाना है...।“ यह बात सुनने में बहुत सामान्य लगती है पर सही एवं महत्वपूर्ण है। ध्यान से देखें तो “चलता है” की प्रवृत्ति जैसे अब हमारी संस्कृति या कल्चर ही बन गयी है। यह हमारे जीवन में ऐसे रच बस गयी है कि हमें लगता है कि इसके बिना कोई काम नहीं हो सकता। यदि कहीं बदलाव आता भी है, तो हमारा मन मानने को तैयार नहीं होता, यहाँ तक कि हम परेशान भी होते हैं पर फिर चलता है कि प्रवृत्ति से समझौता कर स्वयं ही उस पर सही की मोहर लगा लेते हैं -

नेता भष्ट्राचार करते हैं – चलता है; नेता भष्ट्राचार नहीं करेगे तो कौन करेगा?

अफसर - कर्मचारी रिश्वत लेते हैं-- चलता है; रिश्वत नहीं लेगें तो जीएगें कैसे?

बिना चढावा चढाये काम नहीं बनता है-- चलता है; काम हो रहा है क्या इतना कम है?

बिना डोनेशन के स्कूल में एडमिशन नहीं मिलता-- चलता है; डोनेशन नहीं लेंगे तो खर्च कैसे निकलेगा?

शानदार पैकिंग में घटिया माल -- चलता है; जाने दो, अगली बार देख समझकर लेगें....

आजकल आदमी नहीं पैसा ही सब कुछ है--- चलता है; आदमी नहीं, पैसा भगवान है......

वास्तव में इस “चलता है” की मानसिकता के कारण यदि आज बिना भष्ट्राचार, डोनेशन, रिश्वत,धोखाधड़ी और पैसे के बिना काम बन जाये तो आश्चर्य होता है।


क्या मोदीजी की कही इस बात को आत्मसात कर “चलता है” कि मानसिकता से मुक्त हो बदलाव का जमाना ला पायेंगे हम...????     

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