पिता की याद

 

जब भी देखती हूँ, कोई घना पेड़,

कुछ पल उसके पास ठहर जाती हूँ।

और पिता जो मुझसे दूर रहते हैं,

उन्हें अपने बहुत करीब पाती हूँ।

उसकी झूमती मुस्कराती डालियाँ,

पिता की बाहों की याद दिलाती हैं,

झुक जाती हैं मेरे आस-पास,

और फिर मुझे, गले लगाता है।

उसके सुर्ख पत्ते जब गिरते हैं मुझपर,

चूमते हैं माथा, बरसाते हैं आशीष मुझपर।

और कह रहे हों मानो,

न हो कोई बुरी नज़र तुझ पर।

उसके खुरदुरे तने से लिपटकर,

मैं जी भर कर, रो लेती हूँ,

उसको ही पिता कंधा समझ,

कुछ पल ही सही, मैं सुकून से सो लेती हूँ।

और पिता जो मुझसे दूर रहते हैं,

थोड़ी देर ही सही, उनके करीब हो लेती हूँ।

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