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सूर्योपासना का महत्त्व

  हमारी भारती य संस्कृति में सूर्य देव को विशेष स्थान प्राप्त है। उन्हें प्रत्यक्ष देवता कहा गया है , क्योंकि वे हमें प्रतिदिन दिखाई देते हैं और समस्त जीवन के आधार हैं। सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना करना भी असंभव है। वे हमें प्रकाश , ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। सूर्योपनिषद के अनुसार, समस्त देव, गंधर्व और ऋषि सूर्य रश्मियों में निवास करते हैं। स्कंदपुराण में कहा गया है कि सूर्य को अर्ध्य दिए बिना भोजन करना पाप के समान है। ब्रह्मपुराण के अध्याय 29-30 में सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता मानते हुए सभी देवों को इनका प्रकाश स्वरूप बताया गया है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में प्रकृति की उपासना का विशेष स्थान रहा है और इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है सूर्योपासना जिसमें सूर्य देव को जल अर्पित किया जाता है , जिसे अर्घ्य देना कहा जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और आज भी लोग श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इसका पालन करते हैं। अर्घ्य देना केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है , बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व भी छिपा हुआ है। कुल मिलाकर हम यह स्वीक...

किसी से अपनी तुलना न करें — आत्मसम्मान और प्रगति का मूल मंत्र

  आज के समय में, जहाँ सोशल मीडिया और प्रतिस्पर्धा हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही है, लोग अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं। किसी की सफलता, किसी का रूप, किसी की संपत्ति या जीवनशैली देखकर हम अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। लेकिन सच यह है कि  अपनी तुलना दूसरों से करना न केवल गलत है, बल्कि यह हमारे आत्मविश्वास और मानसिक शांति को भी नुकसान पहुँचाता है।   जब हम दूसरों की उपलब्धियों को देखकर उससे अपनी तुलना करते हैं, तो भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति अलग होता है। हर किसी की सोच, क्षमता, परिस्थितियाँ और जीवन का उद्देश्य अलग होता है। हमें लगता है कि हम पीछे हैं। यह भावना धीरे-धीरे हमारे आत्मविश्वास को कम कर देती है।  इस संबंध में एक कहानी अत्यंत प्रासंगिक है। जंगल में एक कौआ रहता था और वह अपने जीवन से बिल्कुल संतुष्ट था। लेकिन एक दिन उसे एक हंस दिखाई दिया। हंस को देखकर कौआ सोचने लगा कि यह हंस तो बहुत सफ़ेद है और मैं बहुत काला हूँ। यह हंस अवश्य ही दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा। उसने हंस से अपने विचार व्यक्त किये। हंस ने उत्तर दिया कि क्या तुमको वास्तव में ऐसा लगता है। ऐ...

उत्थान और पतन: जीवन का अनिवार्य सत्य

  जीवन एक सतत यात्रा है, जिसमें उत्थान और पतन  दोनों ही अनिवार्य स्थिति हैं। यह प्रकृति का नियम है कि हर ऊँचाई के बाद एक गिरावट आती है और हर गिरावट के बाद फिर से उठने का अवसर मिलता है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वही जीवन में सच्ची सफलता और संतुलन प्राप्त करता है। उत्थान हमें गर्व, आत्मविश्वास और खुशी देता है। जब हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं या सफलता की ऊँचाइयों को छूते हैं, तो हमें लगता है कि हमने सब कुछ हासिल कर लिया। लेकिन इसी समय हमें सबसे अधिक सजग रहने की आवश्यकता होती है, क्योंकि अहंकार और लापरवाही अक्सर पतन का कारण बनते हैं। सफलता के क्षणों में विनम्रता बनाए रखना ही सच्चे विजेता की पहचान है। दूसरी ओर, पतन जीवन का वह चरण है जो हमें परखता है। असफलता, हार या कठिनाइयाँ हमें कमजोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें मजबूत और अनुभवी बनाती हैं। जब हम गिरते हैं, तभी हमें अपनी गलतियों का एहसास होता है और सुधार का अवसर मिलता है। पतन हमें यह सिखाता है कि धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने पतन से सीख ली, उन्होंने ही महान उत्थान किय...

मन की शक्ति

मनुष्य के जीवन में यदि कोई सबसे शक्तिशाली तत्व है , तो वह उसका मन है। मन ही हमें ऊँचाइयों तक ले जाता है और मन ही हमें गहराइयों में धकेल देता है। शरीर की शक्ति सीमित होती है , लेकिन मन की शक्ति असीम होती है। इसलिए जीवन में सफलता , संतुलन और शांति पाने के लिए सबसे पहले अपने मन को सशक्त बनाना आवश्यक है। मन की कमजोरी ही हमारे अधिकांश दुःखों का कारण बनती है। जब हम परिस्थितियों से डर जाते हैं ,   दूसरों की बातों से टूट जाते हैं , और असफलता से घबरा जाते हैं—तब वास्तव में हमारी हार बाहर से नहीं , बल्कि भीतर से होती है। इसके विपरीत , यदि मन दृढ़ हो , तो कठिन से कठिन परिस्थितियाँ भी हमारे आगे झुक जाती हैं। इतिहास गवाह है कि जिन्होंने अपने मन को मजबूत बनाया , उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया। मन को सशक्त बनाने का पहला उपाय है—सकारात्मक सोच। विचार ही हमारे मन का निर्माण करते हैं। यदि हम हर परिस्थिति में नकारात्मक पहलू ही देखते रहेंगे , तो मन कमजोर होता जाएगा। लेकिन यदि हम हर कठिनाई में अवसर खोजने की आदत डाल लें , तो हमारा मन धीरे-धीरे मजबूत होने लगेगा। सकारात्मक सोच का अर्थ यह नहीं कि समस्...

हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं… एक एहसास है

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कभी सोचा है… हम हिंदी सिर्फ बोलते नहीं, बल्कि जीते हैं? भारत की प्यारी भाषा है हिंदी, जग में सबसे न्यारी भाषा है हिंदी। जन-जन की भाषा है हिंदी, हिंद को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है हिंदी। कालजयी जीवनरेखा है हिंदी, जीवन की परिभाषा है हिंदी। हिंदी की बुलंद ललकार से ही हमने आज़ादी पाई,  हर देशवासी की इसमें भावना समाई। इसके मीठे बोलों में ऐसी शक्ति है, जो अपने ही नहीं, परायों को भी अपना बना लेती है। हर भाषा को अपनी सखी-सहेली मानती है, ऐसी है हमारी अनूठी, अलबेली हिंदी। संस्कृत से निकलती है हिंदी की धारा, भारतेंदु और जयशंकर ने इसे दुलारा। जहाँ निराला और महादेवी ने इसे संवारा, वहीं दिनकर और सुभद्रा ने इसे निखारा। ऐसे महापुरुषों की प्यारी है हिंदी, हिंद का गर्व है हिंदी। लेकिन विडंबना देखिए… हम हिंदी को अपनी धरोहर मानते हैं, फिर भी उसे बोलने में सकुचाते हैं। विदेशी भाषा बोलना हमें गर्व लगता है, और अपनी भाषा कहीं पीछे छूट जाती है। जबकि आज तो विदेशी भी “हरे रामा, हरे कृष्णा” बोलकर हिंदी संस्कृति के रंग में रंग जाते हैं। तत्सम, तद्भव, देशी-विदेशी— हर रंग को अपनाती है हिंदी...

जब पेड़ थे… तब ज़िंदगी भी थी

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मुझे याद आते हैं वो दिन… जब हवा सुहानी बालों से खेल जाती थी, हर घर-आँगन में हरियाली होती थी, और हर सुबह चिड़ियाँ चहचहाकर हमें जगाती थीं। पर अब… पेड़ों के कट जाने से वो मीठा सपना टूट गया है। अब न चिड़ियों की वो चहचहाहट सुनाई देती है, न मिट्टी की वो सौंधी खुशबू महसूस होती है। धरती माता भी जैसे प्यासी हो गई है, न बादल पहले जैसे गरजते हैं, न वैसे बरसते हैं। सोचिए… अगर वनों का विनाश यूँ ही चलता रहा, तो जीवन में त्रास ही त्रास रह जाएगा। अगर पेड़ ही नहीं रहेंगे, तो बारिश कहाँ से आएगी? नदी-नाले सूख जाएँगे, और पशु-पक्षी कहाँ जाएँगे? अब समय आ गया है… हमें रुकना होगा, सोचना होगा, और इस विनाश को रोकना होगा। हे मानव, अब तो जागो ज़रा… वरना ये जीवनदायिनी धरा हमें कभी क्षमा नहीं करेगी। पेड़ों से प्यार करो, उन्हें अपना मित्र समझो। पेड़ लगाकर, तुम सिर्फ प्रकृति का नहीं, बल्कि अपना ही उपकार करोगे।

धरा पर स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ!

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बेटियाँ बोझ नहीं होतीं… ‘नवयुग’ यही कहता है। खुशियाँ लुटाती हैं, दुःख-दर्द को अपने दिल में समेट लेती हैं। हर रिश्ते को सहेजकर रखने वाली, इसलिए तो ‘धारिणी’ कहलाती हैं बेटियाँ। बेटियाँ अब सहारा बन गई हैं… जैसे सुबह का सूरज नई उम्मीद देता है, वैसे ही बेटियाँ हर घर को रोशन करती हैं। जलती-तपती भी हैं, और शाम की ठंडक बनकर सुकून भी देती हैं। किसी से कम नहीं हैं बेटियाँ। देखो तो सही… हर कर्तव्य निभा रही हैं बेटियाँ। कहीं मीरा की भक्ति, कहीं लक्ष्मी की समृद्धि, कहीं दुर्गा की शक्ति, तो कहीं सरस्वती की बुद्धि बनकर हर रूप में नज़र आती हैं बेटियाँ। नदी की धारा सी बहती हैं, मशाल की तरह जलती हैं। सूरज की लालिमा भी हैं, और हवा की खुशबू भी। आसमान में सितारों सी जगमगाती हुई, धरती को स्वर्ग बना रही हैं बेटियाँ।

हमारी अनूठी-अलबेली हिन्दी

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हिन्दी भाषा की आओ, तुमको पहचान कराएँ, अपनाकर इसे हम अपना, जीवन सफल बनाएँ।   हिन्दी नहीं किसी की दासी, हिन्दी है गंगा का पानी, हिन्दी है भारत की भाषा, हिन्दी भारत की रानी।   हिन्दी शक्ति रूप है, कर लो इसको नमन, शिव से इसे चन्द्र मिला, ओम नाम उच्चारण।   बह्मा जी के वेदों में, जब संस्कृत उच्चारण आया, हिन्दी के साथ मिलकर सुन्दर शब्द बनाया, वेद, पुराण और गीता पढ़कर, सब प्राणियों ने जीवन सुखद बनाया।   भारत में ही जन्मी हिन्दी, भारत में ही परवान चढ़ी, भारत इसका घर-आंगन है, नहीं किसी से कभी लड़ी।   बिन्दी लगा आदर्श बनी, यूँ भारत देश की नारी, पूरा देश अपनाए इसको, हुई अंग्रेजों पर ये भारी।   सबको गले लगाकर चलती, करती सबकी अगवानी, याचक नहीं, नहीं है आश्रित, सदा सनातन अवढ़रदानी।   खेतों खलियानों की बोली,आँगन-आँगन की रंगोली, सत्यम्-शिवम्-सरलतम्-सुन्दर, पूजा की यह चंदन रोली, जन-जन की भाषा यह, कण-कण की वाणी कल्याणी।   भूख नहीं है इसे राज की, प्यास नहीं इसे ताज की, करती आठों पहर तपस्या, रचना करती नव समाज की।   समय आ गया है, उठो, जागो और संकल्प करो, अ...

बेटियों की डोलियाँ क्यों उठती हैं

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बिटिया है मेरी, जन्मी थी जब लगा जैसे नन्ही सी एक परी सुनहरे रंगो में रंगे आसमां से उतरी हो, जैसे सतरंगी आसमानी महकते फूलों की कली।   फुदकती थी हमेशा मेरे काँधे पर यूं ही गौरैया की तरह, नन्हे-नन्हे हाथों से दुलारती, पुचकारती, कलोल करती, उछलती कूदती घूमती घर भर में नन्ही सी परी।   न जाने कब समय ने छीन लिया  उसका चहकना, नन्हे-नन्हें कदमों में बंधी छम-छम पायल का छनकना दो चाँदी जैसे दाँतों से प्यार से काटना, मेरे पेट पर ही लेटे-लेटे सो जाना, वो घर में रौनक-रोशनी का बिखेरना। कद क्या बढ़ा, जैसे जिम्मेदार हो गई, कब बड़ी हो गई, समझदार हो गई। जिसकी गोद में पली, उसे ही ज्ञान देने लगी माता पिता के स्वास्थ्य पर ध्यान देने लगी, अपने आदर्श मुझमें ही टटोलने लगी मेरी हर अच्छाई की नकल करने लगी।   बेटियों की डोलियाँ क्यों उठती हैं? सदा के लिए चली जाती हैं पराए अनजान द्वार, बन जाती हैं अजनबी किसी और घर की पहचान।   यही है सब परियों की कहानी, सोचते तो हैं सभी कि परी अपने आसमां में रहे, अपने तारे चुने, सपने बुने, स्वावलंबी बने, आत्म सम्मानी बने, क्यों छोड़े घर बाबुल का अपने क्यों न साथ...

इंसान परेशान बहुत है!

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कभी-कभी यूँ ही ख्याल आता है, अच्छी थीं वो पगडंडी अपनी अब सड़कों पर तो जाम बहुत है, फुर्र हो गई फुर्सत अब तो लोगों के पास काम बहुत है।   नहीं ज़रूरत घर में बूढ़ों की अब हर कोई बुद्धिमान बहुत है, उजड़ गए सब बाग-बगीचे दो गमलों में ही अब शान बहुत है।   मट्ठा, दही नहीं खाते हैं अब कहते हैं ज़ुकाम बहुत है, पीते हैं जब चाय तब कहीं कहते हैं आराम बहुत है।   बंद हो गई चिट्ठी, पत्री फोनों पर पैगाम बहुत है, आदी हैं ए०सी० के इतने कहते बाहर घाम बहुत है।   झुके-झुके स्कूली बच्चे बस्तों में सामान बहुत है, सुविधाओं का ढेर लगा है पर इंसान परेशान बहुत है।

तुम उड़ो! तुम आनंद मनाओ!

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  तुम मस्ती करो! खुद को लाइवली रखो! थोड़ी बहुत चीटिंग भी करो! सिर्फ परिवार, पति और बच्चों का मत सोचो अपने बारे में सोचना सीखो!   घर की देखभाल करती हो न? अब खुद की भी करो! तुम्हारे भीतर एक नटखट, खुशमिजाज लड़की छुपी हुई है जी, उसकी तारीफ करो।   अधिक नहीं, लेकिन दिन का एक घंटा खुद के लिए रखो और उस एक घंटे में, जो तुम्हें अच्छा लगता है, वो करो। तुम्हारे भीतर जो लड़की है न, उसे कभी-कभी गलती करना भी अच्छा लगता है, तो करो।   कोई फर्क नहीं पड़ता, हर कोई अपने हिसाब से खुशियाँ ढूँढ़ रहा है, फिर तुम क्यों पीछे रहो! सखियाँ बनाओ, खुद को व्यक्त करो।   कभी-कभी उस डायट चार्ट को बाजू में रख दो, मस्त बटर मस्तानी खाओ, हो जाने दो जरा इधर-उधर, कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग क्या सोचेंगे..माय फुट बच्चों को कम मार्क्स आएँ कभी, तो जाने दो ना।   उम्र हो गई है...अब क्या रखा है इसमें... ऐसे शब्द कभी मत बोलो, क्योंकि उम्र तो एक संख्या ही है जी, खूब किया सबके लिए, अब निकालो समय खुद के लिए, तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान देख, यकीन है मुझे, सारा घर हँसेगा जी।   एक बात याद रखना .. तुम खुश नहीं रहो...

आज लोग बुढ़ापा एन्जॉय करने लगे

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  अब खुलकर हँसने और जीने लगे, खुद को पोते-पोतियों में नहीं उलझाते अपने जैसे दोस्तों संग ये वक्त बिताते।   कोई लाचारी, बेबसी, उदासी अब नहीं दिखती अब इनकी ज़िन्दगी इनकी शर्तों पर गुज़रती, कभी ये गाने गाते, कभी ठुमके लगाते, अपनी कहानी सुनाते, खुलकर मुस्कुराते।   इनकी किट्टियाँ होती, जन्मदिन मनाते, अपनी पेंशन खुद पर ही ये लुटाते, ना ताना मारते, ना बहुओं की सुनते, अपने अधूरे सपने इस उम्र में बुनते।   फेसबुक यूट्यूब के ये दीवाने होते, इनके भी किस्से फ़साने होते, इनको भी दोस्तों का इंतजार होता, पार्क में रोज़ यारों का जमघट होता।   अब के बुजुर्ग समझने लगे ज़िन्दगी के बचे लम्हें जीने लगे, समझ गए साथ कुछ नहीं जाने वाला, तो खुशनुमा लम्हें ये सहेजने लगे।

भारत की अन्तरिक्ष यात्रा!

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 “तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस पार क्या है, जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है।” कवियत्री महादेवी वर्मा की यह पंक्तियां प्रमाणित करती हैं कि सभ्यता की शुरुआत से ही मानव अंतरिक्ष की रोमांचक कल्पनाएँ करता रहा है। इन रोमांचक कल्पनाओं में अंतरिक्ष कभी आध्यात्म का विषय बना तो कभी कविताओं और दंत-कथाओं का। पारलौकिकतावाद से प्रभावित होकर कभी मानव ने अपनी कल्पना के स्वर्ग और नरक अंतरिक्ष में स्थापित कर दिये तो कभी मानवतावाद के प्रभाव में आकर पृथ्वी को केंद्र में रखा और अंतरिक्ष को उसकी परिधि मान लिया। धीरे-धीरे जब सभ्यता और समझ विकसित हुई तो मानव ने अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने के लिये प्रेक्षण यंत्र बनाएँ, जिनमें दूरबीनें प्रमुख थीं। इसके बाद प्रारम्भ हुआ विज्ञान के माध्यम से अंतरिक्ष को समझने का प्रयास।  इस क्रम में आर्यभट्ट से लेकर गैलीलियो, कॉपरनिकस, भास्कर एवं न्यूटन तक प्रयास होते रहे। न्यूटन के बाद आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान का विकास हुआ, जो आज इतना परिपक्व हो गया है कि हम मानव को अंतरिक्ष में भेजने के साथ अंतरिक्ष पर्यटन एवं अंतरिक्ष कॉलोनियाँ बसाने की भी कल्पना कर...

बचपन की बस्ती, मासूमियत भरी मस्ती!!

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बचपन की यादें जब भी आती है, मन के बच्‍चे को फिर जगाती है! बचपन के वो दिन, जिनमें भरा था खुशियों का खजाना। कितना सुगम सलोना था, शब्दों में मुश्किल है कह पाना! बचपन....जब लगती थी दुनिया की सारी सच्चाई झूठी, और दादी नानी की हर कहानी लगती थी सच्ची और अनूठी! न खबर थी कुछ सुबह की, न शाम का ठिकाना था। चाहत चाँद को छु लेने की थी, पर दिल तितली का दिवाना था! हर खेल में साथी थे, हर रिश्ता निभाना था थक कर आना स्कूल से, पर खेलने भी तो जाना था! पापा से डरना और माँ से लड़ना, करके कोई गलती फिर उलझन में पड़ना! छोटी-छोटी चीजों में खुशियाँ थी बड़ी-बड़ी, हर काम में मिलती थी शाबाशियाँ घड़ी-घड़ी! कभी पिता के कंधो का, तो कभी माँ के आँचल का सहारा था! वो बचपन कितना सुहाना था, जिसका रोज एक नया फ़साना था! ना कोई परेशानीयों का मेला, ना जिम्मेदारियों का था झमेला! भोली सी शैतानियाँ, अल्हड़ सी नादानियाँ, ना था अपने-पराए का भेद, था तो बस एक छोटा सा सवालों का ढेर! आज याद आ चला वो बचपन सुहाना याद में ले चला जेसे कोई दोस्त पुराना! वक्त के बदलते करवटों के साथ बदलता गया एहसास पर आज भी है वो बचपन बड़ा खास! मालूम है मुझे.......

बस, एक घंटा खुद के लिए !!!

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तुम उड़ो!  तुम आनंद मनाओ! तुम मस्ती करो!  खुद को lively रखो! थोड़ी बहुत चीटिंग भी करो! सिर्फ परिवार , पति और बच्चों का , मत सोचो अपने बारे में सोचना सीखो! घर की देखभाल करती हो न ?  अब खुद की भी करो! तुम्हारे भीतर एक नटखट , खुशमिजाज लड़की छुपी हुई है जी उसकी तारीफ करो। अधिक नहीं , लेकिन दिन का एक घंटा खुद के लिए रखो और उस एक घंटे में , जो तुम्हें अच्छा लगता है , वो करो। तुम्हारे भीतर जो लड़की है न , उसे कभी कभी गलती करना भी अच्छा लगता है , तो करो। कोई फर्क नहीं पड़ता ,  हर कोई अपने हिसाब से , खुशियां ढूंढ़ रहा है ,  फिर तुम क्यों पीछे रहो जीवन में खुशियाँ ढूँढो , जरूर मिलेंगी , बस अपने भीतर की लड़की को.. मस्ती को अपने साथ रखो। 😊 सखियाँ बनाओ ,  खुद को व्यक्त करो।  कभी - कभी उस डायट चार्ट को , बाजू में रख दो ,  मस्त बटर 🧀🍞🍟 मस्तानी खाओ। हो जाने दो जरा इधर उधर ,  कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग क्या सोचेंगे.. my foot बच्चों को कम मार्क्स आए कभी , तो जाने दो ना। उम्र हो गई है...अब क्या रखा है इसमें... ऐंसे शब्द...

मेरा जीवन मेरा है

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शालिनी की अरेंज मैरिज हुई थी। उसने मन ही मन सोच रखा था कि ससुराल में सभी से बहुत अच्छे से रहूंगी। घर के कामों में भी होशियार, पढ़ी लिखी समझदार, ससुराल भी अच्छा, सास ससुर ननद देवर सभी अच्छे से रहते! फिर भी कभी-कभी सास किचन के किसी काम के लिए ...घर के साफ सफाई के लिए... ससुर जी उसके पहनावे के लिए.... देवर कभी खुद के कपड़ों के लिए.... ननंद किसी बात के लिए कभी-कभी बहस कर लेती....! शलिनी जब अपने पति से कभी इस बारे में कुछ कहती तो एक ही जवाब आता, ''मैं क्या कर सकता हूं? ना मैं अपनी मम्मी को कुछ कह सकता हूं ना तुम्हें !'' दिन महीने में बदले और महीने साल में...लेकिन यह सिलसिला चलता रहा और बढ़ता रहा! जब शालिनी को घर में लगभग हर चीज़ के लिए टोका जाने लगा, उसके हर काम में गलती निकली जाने लगी और उसे हर बार एक ही जवाब मिलने लगा कि मैं क्या ही कर सकता हूँ, तो उसने मन ही मन सोच लिया कि यह समस्या मेरी अपनी है!  शलिनी ने सोच लिया कि मुझ में क्या कमी है कि मैं सबको खुश करूँ लेकिन खुद दुखी होकर! मुझे अच्छे से रहने का पूरा अधिकार है! मैं खुशी से रहूँगी! दूसरों से पहले अपनी खुशी का ध्यान रखना...

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